शनिवार, अप्रैल 24, 2010

ग़ज़ल
फिर से वो ही शाम- गम, फिर वही तन्हाइयां
वक़्त मेरा क्यूँ नहीं लेता कभी अंगडाइयां

मैं तुम्हारी दीद का बस मुन्तजिर ही रह गया
और उधर दर पर तेरे बजने लगीं शेहनाइयां

एक ख़त तुझको लिखा था, वक़्त पर पहुंचा नहीं
नामाबर बेलौस था पर कर गया नादानियाँ

उस अदालत को खुदा का घर समझना ठीक है
जिस अदालत में वफ़ा की हो सकें सुनवाइयां

जब सियाह्बख्ती ने आखिर ढक दिया मेरा नसीब
तब भला किस काम की आखिर मेरे रानाइयां

इस मुताल्लिक मैं किसी से कुछ भी आखिर क्या कहूं
काश कोई आके समझे दर्द की गहराइयां

आखरी में दिल को बहलाने की खातिर कह गया
वो मुसाफ़िर प्यार के मानी तो हैं कुर्बानियाँ

विलास पंडित"मुसाफ़िर"

1 टिप्पणी:

  1. namaste Vilas saHeb!
    aapkee sabhee rachnaayeiN bahut achchhee hai. abhee kuchh hee paDh paayaa huN. ab is blog par aataa rahungaa aur inkaa lutf uThaataa rahungaa.
    matle meN shaayad typo ho gayee hai , so pehle misre kaa wazn kharaab ho gayaa hai (mumkin hai keh merii ghalatfehmee ho). aap jaise umdah shaair ko pdhnaa khushnaseebee kee baat hai.
    khairandesh
    Dheeraj Ameta "Dheer"

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