गुरुवार, मार्च 03, 2011

ग़ज़ल

जिस तरफ जाता हूँ, उस जा चोट ही खाता हूँ मैं
इन दिनों  ये हाल है कि खुद से घबराता हूँ मैं

कर दिया बेज़ार मुझको इस फ़क़ीरी ने बहोत 
ख़ुद ही अपना दिन-ओ -अपनी रात हो जाता  हूँ मैं 

किसको फ़ुर्सत है जो आकर  दास्ताँ मेरी सुने 
नींद में बिस्तर को अपने राज़ बतलाता हूँ मैं

आजकल दिल की नहीं दौलत की सुनते हैं सभी 
बनके दीवाना भला  क्यूँ उस गली जाता हूँ मैं 

मेरी ग़ज़लें, मेरे नगमें याद आयें जब तुम्हे 
ये समझ लेना कि अपने ज़ख्म सहलाता हूँ मैं 

क्या दिया है ज़िन्दगी ने कुछ नहीं ग़म के सिवा 
मौत तेरी बज़्म में, अब रुक ज़रा आता हूँ मैं 

हूँ "मुसाफ़िर" ज़िन्दगी ने सख्त कर डाला मुझे 
बस ग़ज़ल की बर्फ  से ही ख़ुद को पिघलाता हूँ मैं 



विलास पंडित "मुसाफिर "




2 टिप्‍पणियां:

  1. जिस तरफ जाता हूँ, उस जा चोट ही खाता हूँ मैं
    इन दिनों ये हाल है कि खुद से घबराता हूँ मैं
    kya bat hai !

    मेरी ग़ज़लें, मेरे नगमें याद आयें जब तुम्हे
    ये समझ लेना कि अपने ज़ख्म सहलाता हूँ मैं
    bahut khoob !

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