मंगलवार, मई 11, 2010

ग़ज़ल

हम अजल* को हयात मानेंगे
तुम जो कहदो वो बात मानेंगे

सिर्फ इक आपकी ख़ुशी के लिए
जीत को अपनी मात मानेंगे

सजके निकलेगा इक दीवाने का
जब जनाज़ा, बरात मानेंगे

नामुरादी के सिलसिले आख़िर
अब तो खुद को अलात* मानेंगे

ज़ब्ते गिर्या* का फ़न सिखा डाला
ज़िंदगी की बिसात * मानेंगे

आपकी एक हाँ को ऐ हमदम
सात जन्मों का साथ मानेंगे

उस "मुसाफ़िर" के ज़ख्म देखे हैं
दोस्तों को शनात * मानेंगे


शब्दों के अर्थ :- अजल = मौत, अलात =जिस पर रखके लोहा कूटा जाता है, ज़ब्ते गिर्या का फ़न = आंसू पीने की कला , बिसात= हिम्मत, शनात = शत्रु गण

विलास पंडित "मुसाफ़िर"

2 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. Vilas ji, bahtu khoob, bhai wah!!! lagbhag saari ghazalen ek baar me hi padh gaya, aur bahut prasannata hui, mujhe khushi hogi yadi main aapki koi ghazal ya koi naya geet swarbaddh kar saka....badhai

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