गुरुवार, मई 06, 2010

ग़ज़ल

हंसाया गया हूँ , रुलाया गया हूँ
खिलौना मुनासिब बनाया गया हूँ

इंसान हूँ तो तारुफ़ है मेरा
अफसाना हूँ मैं सुनाया गया हूँ

गरजमंद था मुझसे हर शख्स ज्यादा
तेरे दर पे जब में खुदाया गया हूँ

लहरों मुहब्बत के बारे में सोचो
वही नाम हूँ जो मिटाया गया हूँ

रिश्तों के कांटे बिछे थे जहां पर
मैं उस राह पर ही सुलाया गया हूँ

मैं जिंदा था जब किसी ने पूछा
बाद मरने के आखिर सजाया गया हूँ


विलास पंडित "मुसाफ़िर"

4 टिप्‍पणियां:

  1. इंसान हूँ तो तारुफ़ है मेरा
    अफसाना हूँ मैं सुनाया गया हूँ

    सुन्‍दर ....

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  2. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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  3. " बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता "

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