शुक्रवार, जनवरी 21, 2011

आवारगी में यूँ तो क्या क्या नहीं किया 
यारों मगर किसी से धोका नहीं किया.

थे चारसू हमारे गुनाहों के सिलसिले 
दामन बचा के रखलिया मैला नहीं किया 

कश्ती की जुस्तजू में बसर ज़िन्दगी तो की 
लेकिन किसी ने पार वो दरिया नहीं किया 

वादा तो आप कर गए निभाया नहीं मगर
मेरी नज़र में आपने अच्छा नहीं किया 

शायद मेरा नसीब ही पतझड़ था, धूप  थी 
आख़िर किसी दरख़्त ने साया नहीं किया 

ये क्या तुम्हारी आँख में आंसू भी आ गए 
हमने शुरू तो दर्द का क़िस्सा नहीं किया 

बाज़ार तो सजा था, गुनाहों का हर तरफ 
हमने मगर ज़मीर का सौदा नहीं किया  

विलास पंडित "मुसाफ़िर"
(C) copyright by : Musafir 

2 टिप्‍पणियां:

  1. वह! बहुत खुबसूरत ग़ज़ल| धन्यवाद|

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  2. वादा तो आप कर गए निभाया नहीं मगर
    मेरी नज़र में आपने अच्छा नहीं किया

    शायद मेरा नसीब ही पतझड़ था, धूप थी
    आख़िर किसी दरख़्त ने साया नहीं किया
    laazwaab ,behtrin gazal ,gantantra divas ki badhai ,jai hind .

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