गुरुवार, जनवरी 06, 2011

ग़ज़ल

वो यकीनन ही किसी का हो गया
शौक जिसकी शाइरी का हो गया

अब कोई बदलाव आना चाहिए
आस्मां आख़िर ज़मीं का हो गया

ज़िन्दगी तुझसे शिकायत हो गई
जब तमाशा बेबसी का हो गया

फैसला उसकी अदालत में मेरे
हर नफस हरइक घड़ी का हो गया

प्यार के दुश्मन भी मुंह की खा गए
ख़ुद समंदर जब नदी का हो गया

इक झलक के लोग प्यासे थे मगर
वो तो दीवाना गली का हो गया

होश अपना फिर कहाँ कायम रहा
जब तसव्वुर इक परी का हो गया

विलास पंडित "मुसाफ़िर"
(C) copyright by Musafir




6 टिप्‍पणियां:

  1. वो यकीनन ही किसी का हो गया
    शौक जिसकी शाइरी का हो गया

    बहुत अछा मतला कहा है जनाब ...
    और
    अब कोई बदलाव आना चाहिए
    आस्मां आख़िर ज़मीं का हो गया
    ढेरों,, ढेरों लफ़्ज़ों में भी
    ना कह सकी जाने वाली बात
    आपने इस शेर में बयाँ कर दी है ...
    ....
    जब तसव्वुर इक परी का हो गया
    जी हाँ ... ग़ज़ल का मिज़ाज यूं भी तो हुआ करता है
    बहुत खूब !!

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  2. शुक्रिया मुफ़लिस साहेब, सब आप जैसे कद्रदानो का प्यार है बस.

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  3. लाजवाब लेखन कला का परिचय दे रही है आपकी ये प्रस्तुति. बेहतरीन ग़ज़ल. हर शेर इक गहरी बात लिए हुए है.वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें इससे सबको असुविधा होगी और आपके ब्लॉग तक कम लोग पहुँच पाएंगे

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  4. होश अपना फिर कहाँ कायम रहा
    जब तसव्वुर इक परी का हो गया
    अब कोई बदलाव आना चाहिए
    आस्मां आख़िर ज़मीं का हो गया
    laazwaab har baat .nav barsh ki badhai .

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  5. रचना जी, ये वर्ड वेरिफिकेशन कहाँ मिलेगा. कृपया ज़रूर बताएं

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