मंगलवार, जनवरी 11, 2011

ग़ज़ल

चमन का फूल, सितारों की दिलकशी तुम हो
मेरी हयात की ताबिंदा ज़िन्दगी तुम हो 

मैं एक रिन्दे-खराबात हूँ ज़माने में 
मेरे सुरूर की दुनिया हो मयकशी तुम हो 

तुम्हारे दम से है कैफ़-ओ-सुरूर का आलम 
ग़ज़ल का हुस्न हो, गीतों की मौसिकी तुम हो 

तुम्हारे हुस्न की दुनिया में जब हुई हलचल 
यकीं हुआ कि कोई अर्श की परी तुम हो 

अभी तो तुमको "मुसाफ़िर" ही बनके रहना है 
ये बात याद भी रक्खो कि अजनबी तुम हो

विलास पंडित "मुसाफ़िर"
(c) Copyright By: Musafir
This ghazal was created by me in 1990. Sung by Renowned Singer "Anwar"

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें