गुरुवार, अक्तूबर 21, 2010

ग़ज़ल

दिल की हालत न पूछिए साहब

ये हक़ीक़त न पूछिए साहब


अश्क आँखों में आ ही जायेंगे

ग़म की लज्ज़त न पूछिए साहब


जिसने बर्बाद कर दिया आख़िर

वो ही आदत न पूछिए साहब


लूटने वाले कम नहीं लेकिन

दिल की दौलत न पूछिए साहब


खामख्वाह आप टूट जाओगे

राज़-ए-उल्फत न पूछिए साहब


ज़र्रा-ज़र्रा वजूद रखता है

उसकी कुदरत न पूछिए साहब


विलास पंडित "मुसाफिर"

(c) Copyright By :Musafir

1 टिप्पणी:

  1. लूटने वाले कम नहीं लेकिन
    दिल की दौलत न पूछिए साहब
    यही तो सबसे बड़ी चीज़ है, दिल की दौलत। लूट कौन कितना लूट सकता है। बहुत अच्छी ग़ज़ल। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    पक्षियों का प्रवास-२, राजभाषा हिन्दी पर
    फ़ुरसत में ...सबसे बड़ा प्रतिनायक/खलनायक, मनोज पर

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