शुक्रवार, अगस्त 05, 2011

आंसुओं से भीगी हुई एक ग़ज़ल .......





ग़म के मंज़र ग़म की राहें, अब नहीं 
ज़िन्दगी तेरी पनाहें , अब नहीं 

मेरे शेरों में नहीं अब लज्ज़तें 
आप मुझको क्यूं सराहें, अब नहीं 

दम मेरा घुटता है सीने में बहोत 
हाय वो आंसूं वो आहें, अब नहीं  

ख़ुद को ही अब क़त्ल करना है मुझे 
आपकी कातिल निगाहें, अब नहीं 

मौत की आगोश मिल जाए फ़क़त 
आपकी मखमल सी बाहें, अब नहीं 

ख़ुद ही करना है अब ख़ुद का फ़ैसला
दोस्तों की कुछ सलाहें, अब नहीं

मुसाफ़िर 


3 टिप्‍पणियां:

  1. ख़ुद को ही अब क़त्ल करना है मुझे
    आपकी कातिल निगाहें, अब नहीं

    मौत की आगोश मिल जाए फ़क़त
    आपकी मखमल सी बाहें, अब नहीं

    बहुत बढ़िया...

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  2. दोस्तों की कुछ सलाहें, अब नहीं....

    अच्छी ग़ज़ल में अच्छी बात !
    बहुत खूब !!

    "दानिश"

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