मंगलवार, अक्टूबर 30, 2012

ग़ज़ल


दूर मेरी ज़िन्दगी से सब अँधेरे हो गए 
कुछ पराये दर्द थे, जो आज मेरे हो गए 

दे गया उस पल खुदा, दुनिया हमें एहसास की 
जब ख़ुशी के साथ गम के सात फेरे हो गए 

भर गया वो पत्तियों से फिर हरा होने लगा 
उस शजर पे पंछियों के जब बसेरे हो गए 

घुट गया दम उस जगह रिश्तों का देखो तो ज़रा 
हम से बँट कर आदमी जो तेरे मेरे हो गए 

क्या कोई झोंका हवा का फिर दीवाना हो गया 
आसमां पर किसलिए बादल घनेरे हो गए 

डूबती शब है "मुसाफिर" से ही पूछेगी अभी 
हम भला क्यूँकर जुदा इतने सवेरे हो गए 

मुसाफिर 

मंगलवार, अक्टूबर 09, 2012

Ghazal


ज़हर है, या के दवा है, क्या है 
भर के पैमाना दिया है, क्या है 

तेज़ लपटों को देखने वालों 
सिर्फ़ धुआं सा उठा है, क्या है 

क़ैद हैं अब भी अनगिनत पंछी 
इक परिंदा ही उड़ा है, क्या है 

है ख़ुशी, वार सामने से किया 
तीर सीने में लगा है, क्या है 

घर में बर्तन जो हैं, तो खनकेंगे 
भीड़ क्यूं इतनी जमा है, क्या है 

मुसाफ़िर 

शनिवार, मई 05, 2012

हसरत ....


ग़म के हालात का बयां दे दो 
अपनी चुप को ज़रा ज़ुबां दे दो 

मैं बुज़ुर्गों से कह गया इक दिन 
मुझको दौलत नहीं, विरासत में 
हर तजुरबे की वसीयत करके 
बस अंगूठे का इक निशां दे दो 

अपनी ख्वाहिश मैं बताऊँ किसको 
हर तरफ हो सुकून, राहत हो 
तन पे कपडा हो, पेट में खाना 
मेरी आँखों को ये समां दे दो 

देखकर इस जहां की हालत को 
दिल से आंसूं निकल ही पड़ते हैं 
चंद तब्दीलियों की है हसरत 
इस ज़मीं को वो आसमां दे दो 

जिसके दिल में वतन-परस्ती हो 
जिसकी हसरत में अम्न हो बाक़ी 
हम ग़रीबों के इस मुक़ददर में 
ऐसा कोई तो हुक्मरां दे दो 

मुसाफ़िर 

सोमवार, अप्रैल 23, 2012

गंतव्य



वो भरना चाहता था 
ऊँची उड़ान ..
उसके पंखों में थी 
हौसलों की जान 
क्या करना है 
क्या नहीं 
कर चुका था इस बात का फ़ै
जाने अनजाने 
कितने ही लोगों का मसीहा बन गया..सला 
उसे लिखना थी एक नई इबारत 
कर लिया उसने इरादों पे अमल 
घर से गया बेख़ौफ़ निकल 
जी तोड़ मेहनत लायी रंग 
कई लोग हो लिए उसके संग
वो करता था ग़रीबों के हक़ में काम 
दुनिया करने लगी थी उसे सलाम 
रोज़ करना है कुछ न अच्छा 
यही उसका ध्येय था सच्चा
लोग उसे समाजसेवी कहते 
और घरवाले उसे कहते पागल 
पिताजी रुष्ट थे उसके इस काम से
पुश्तैनी काम छोड़
जुड़ गया था अवाम से
एक दिन उसे एक लिफाफा मिला 
कर दिया गया वो पिता की संपत्ति से 
बेदखल 
वो आज बहुत प्रसन्न था
अब उसे नहीं था किसी का डर
शुक्र है आज पिता जी ने जान लिया 
मेरा मंतव्य 
अब तो बस मैं हूँ और 
मेरा गंतव्य....

गुरुवार, नवंबर 03, 2011

ग़ज़ल


दिल की बस्ती इसक़दर जब जल रही है 
क्यूं हवा फिर तेज़ इतनी चल रही है 

हाँ वो पैदाइश अमीरों की थी मगर 
अब किसी मजदूर के घर पल रही है 

इश्क़ में इज़हार होना है फ़क़त 
बात इतनी सी है लेकिन टल रही है 

आप हैं मसरूफ अपनी ही ख़ुशी में 
शाम आँखों में हमारी ढल रही है 

आपको आना है तो आ जाइये 
बर्फ जैसी सांस मेरी गल रही है

मैंने उससे प्यार माँगा था कभी
हाथ अपने देखिये अब मल रही है 

कौन है आख़िर "मुसाफ़िर" कौन है 
आपकी महफ़िल में ये हलचल रही है

मुसाफ़िर 

सोमवार, सितंबर 26, 2011


जो भी नैतिक मूल्य थे, वो सब खिलौने हो गए  
आदमी क़द में बड़े पर दिल से बौने हो गए....

उफ़ ये मानवता भिखारन हो गई फुटपाथ की 
खस्ता- हालों के लिए रस्ते बिछौने हो गए 

क्या महक नोटों की, रोटी से भी अच्छी हो गई 
आदमी के कृत्य आख़िर क्यूं घिनौने हो गए 

है पराई औरतों को अब भी पाने की हवस
घर में सारी बेटियों के कबके गौने हो गए 

यूँ तो महँगी हो गई, हर शै इसी बाज़ार की 
भाव बस इंसान के ही औने-पौने हो गए 

विलास पंडित "मुसाफ़िर"

शनिवार, सितंबर 03, 2011

ग़ज़ल ...

उलझनों को और मत उलझाइये 
ज़िन्दगी को प्यार से समझाइये 

दोस्तों की बेवफ़ाई का सबब 
आप अपने दिल को मत बतलाइये 

शोखियां, बदमाशियां, सरगोशियाँ 
उम्र है ये सब तो करते जाइये 

हम दीवाने हैं या पागल हैं ज़रा 
ये पहेली आप ही सुलझाइये 

क्यूं हुए बेरंग भी, बेनूर भी 
आप फूलों को ज़रा महकाइये 

दिल तो क्या घर भी तुम्हारे नाम हैं 
आइये बेख़ौफ़ होकर आइये 

विलास पंडित 
"मुसाफ़िर'