सोमवार, अप्रैल 23, 2012

गंतव्य



वो भरना चाहता था 
ऊँची उड़ान ..
उसके पंखों में थी 
हौसलों की जान 
क्या करना है 
क्या नहीं 
कर चुका था इस बात का फ़ै
जाने अनजाने 
कितने ही लोगों का मसीहा बन गया..सला 
उसे लिखना थी एक नई इबारत 
कर लिया उसने इरादों पे अमल 
घर से गया बेख़ौफ़ निकल 
जी तोड़ मेहनत लायी रंग 
कई लोग हो लिए उसके संग
वो करता था ग़रीबों के हक़ में काम 
दुनिया करने लगी थी उसे सलाम 
रोज़ करना है कुछ न अच्छा 
यही उसका ध्येय था सच्चा
लोग उसे समाजसेवी कहते 
और घरवाले उसे कहते पागल 
पिताजी रुष्ट थे उसके इस काम से
पुश्तैनी काम छोड़
जुड़ गया था अवाम से
एक दिन उसे एक लिफाफा मिला 
कर दिया गया वो पिता की संपत्ति से 
बेदखल 
वो आज बहुत प्रसन्न था
अब उसे नहीं था किसी का डर
शुक्र है आज पिता जी ने जान लिया 
मेरा मंतव्य 
अब तो बस मैं हूँ और 
मेरा गंतव्य....

गुरुवार, नवंबर 03, 2011

ग़ज़ल


दिल की बस्ती इसक़दर जब जल रही है 
क्यूं हवा फिर तेज़ इतनी चल रही है 

हाँ वो पैदाइश अमीरों की थी मगर 
अब किसी मजदूर के घर पल रही है 

इश्क़ में इज़हार होना है फ़क़त 
बात इतनी सी है लेकिन टल रही है 

आप हैं मसरूफ अपनी ही ख़ुशी में 
शाम आँखों में हमारी ढल रही है 

आपको आना है तो आ जाइये 
बर्फ जैसी सांस मेरी गल रही है

मैंने उससे प्यार माँगा था कभी
हाथ अपने देखिये अब मल रही है 

कौन है आख़िर "मुसाफ़िर" कौन है 
आपकी महफ़िल में ये हलचल रही है

मुसाफ़िर 

सोमवार, सितंबर 26, 2011


जो भी नैतिक मूल्य थे, वो सब खिलौने हो गए  
आदमी क़द में बड़े पर दिल से बौने हो गए....

उफ़ ये मानवता भिखारन हो गई फुटपाथ की 
खस्ता- हालों के लिए रस्ते बिछौने हो गए 

क्या महक नोटों की, रोटी से भी अच्छी हो गई 
आदमी के कृत्य आख़िर क्यूं घिनौने हो गए 

है पराई औरतों को अब भी पाने की हवस
घर में सारी बेटियों के कबके गौने हो गए 

यूँ तो महँगी हो गई, हर शै इसी बाज़ार की 
भाव बस इंसान के ही औने-पौने हो गए 

विलास पंडित "मुसाफ़िर"

शनिवार, सितंबर 03, 2011

ग़ज़ल ...

उलझनों को और मत उलझाइये 
ज़िन्दगी को प्यार से समझाइये 

दोस्तों की बेवफ़ाई का सबब 
आप अपने दिल को मत बतलाइये 

शोखियां, बदमाशियां, सरगोशियाँ 
उम्र है ये सब तो करते जाइये 

हम दीवाने हैं या पागल हैं ज़रा 
ये पहेली आप ही सुलझाइये 

क्यूं हुए बेरंग भी, बेनूर भी 
आप फूलों को ज़रा महकाइये 

दिल तो क्या घर भी तुम्हारे नाम हैं 
आइये बेख़ौफ़ होकर आइये 

विलास पंडित 
"मुसाफ़िर'

शुक्रवार, अगस्त 26, 2011

एक गीतनुमा ग़ज़ल आपके लिए ....


कह रहा हूँ अपने दिल की बात तुमसे 
चाहता हूँ बस मैं इक सौग़ात तुमसे

सोचता हूँ कब मिलेंगे ज़िन्दगी में  
वस्ल के अनमोल कुछ लम्हात तुमसे

क्या ये हक़ चाहत में मुझको है सनम 
मांग लूँ मैं बस तुम्हारा हाथ तुमसे 

क्यूं न हो बारिश हज़ारों रंग की 
जुड़ गए हैं अब सभी जज़्बात तुमसे 

तुम समझने की ज़रा कोशिश करो 
कह रहे हैं कुछ  मेरे हालात तुमसे 

शुक्रवार, अगस्त 05, 2011

आंसुओं से भीगी हुई एक ग़ज़ल .......





ग़म के मंज़र ग़म की राहें, अब नहीं 
ज़िन्दगी तेरी पनाहें , अब नहीं 

मेरे शेरों में नहीं अब लज्ज़तें 
आप मुझको क्यूं सराहें, अब नहीं 

दम मेरा घुटता है सीने में बहोत 
हाय वो आंसूं वो आहें, अब नहीं  

ख़ुद को ही अब क़त्ल करना है मुझे 
आपकी कातिल निगाहें, अब नहीं 

मौत की आगोश मिल जाए फ़क़त 
आपकी मखमल सी बाहें, अब नहीं 

ख़ुद ही करना है अब ख़ुद का फ़ैसला
दोस्तों की कुछ सलाहें, अब नहीं

मुसाफ़िर 


मंगलवार, जुलाई 05, 2011

फूल ने तितली से कुछ.....


खिल गया है, राज़े-दिल खोला तो है 
फ़ूल ने तितली से कुछ बोला तो है 

तुम हवा बनकर उसे सुलगा गए
हाँ मेरे सीने में इक शोला तो है 

काश अब ये सिलसिला आगे बढे 
उसने हमको इक नज़र तोला तो है 

यूँ अचानक तल्खियाँ रिश्तों में क्यूं 
अब किसी ने फिर ज़हर घोला तो है

लोग तो मेहदूद हैं, बस ख़ुद तलक 
कुछ वो दुनिया के लिए बोला तो है 

सब समझते हैं खिलौना बस उसे 
वो  "मुसाफ़िर" देखिये भोला तो है 

मुसाफिर