मंगलवार, मार्च 08, 2011

एक बार मुझे मिल जाती तुम..........13 पृष्ठीय कविता "प्रथम पृष्ठ"


एक बार मुझे मिल जाती तुम.....
मेरी ज़िन्दगी का हर ख़्वाब मुक़म्मल हो जाता .....

मैं बसाता सपनों की दुनिया 
जिस दुनिया में होती तो,
सिर्फ़ मोहब्बत होती.....
न होती झूटी रस्में 
न थोपी हुई रिवायत होती......
हर तरफ महकती प्यार की खुश्बू
उन खुशबूओं में डूबकर हम ....
दो जिस्म इक जान हो जाते 
जी भर के प्यार करते ...और 
बाहों में सिमट कर सो जाते....
ज़िन्दगी का हरेक मस'अला
ख़ुद-ब-ख़ुद हल हो जाता 

एक बार मुझे मिल जाती तुम
ज़िन्दगी का हर ख़्वाब मुक़म्मल हो जाता................
विलास  पंडित "मुसाफिर"


सोमवार, मार्च 07, 2011

हे ईश्वर...........

मुझे बख्श दी तूने ज़िन्दगी, तू बड़ा रहीमो-करीम है
मेरी राह में  तेरी रोशनी, तू बड़ा रहीमो-करीम है.

ये तेरे करम का कमाल है, जो फिजां में ऐसा जमाल है
है शबाब पर ये कली-कली, तू बड़ा रहीमो-करीम है

मेरे लब पे तेरा ही नाम हो, तेरे नाम से मुझे काम हो 
ये क़ुबूल कर मेरी बंदगी, तू बड़ा रहीमो-करीम है 

जिसे चाहे रहने को घरभी दे, जिसे चाहे ऊँचा नगर भी दे 
मैं तो पाके ख़ुश हूँ ये दश्त ही, तू बड़ा रहीमो-करीम है 

तेरी गाह में ही पड़ा रहूँ, सदा नेकियों से जुड़ा रहूँ
तेरे नाम हो मेरी शायरी, तू बड़ा रहीमो-करीम है 

मेरी ज़ीस्त में यही बात हो, मेरे सर पे तेरा ही हाथ हो 
मेरी आरज़ू ये है आखरी, तू बड़ा रहीमो करीम है 


विलास पंडित "मुसाफिर"

गुरुवार, मार्च 03, 2011

ग़ज़ल

जिस तरफ जाता हूँ, उस जा चोट ही खाता हूँ मैं
इन दिनों  ये हाल है कि खुद से घबराता हूँ मैं

कर दिया बेज़ार मुझको इस फ़क़ीरी ने बहोत 
ख़ुद ही अपना दिन-ओ -अपनी रात हो जाता  हूँ मैं 

किसको फ़ुर्सत है जो आकर  दास्ताँ मेरी सुने 
नींद में बिस्तर को अपने राज़ बतलाता हूँ मैं

आजकल दिल की नहीं दौलत की सुनते हैं सभी 
बनके दीवाना भला  क्यूँ उस गली जाता हूँ मैं 

मेरी ग़ज़लें, मेरे नगमें याद आयें जब तुम्हे 
ये समझ लेना कि अपने ज़ख्म सहलाता हूँ मैं 

क्या दिया है ज़िन्दगी ने कुछ नहीं ग़म के सिवा 
मौत तेरी बज़्म में, अब रुक ज़रा आता हूँ मैं 

हूँ "मुसाफ़िर" ज़िन्दगी ने सख्त कर डाला मुझे 
बस ग़ज़ल की बर्फ  से ही ख़ुद को पिघलाता हूँ मैं 



विलास पंडित "मुसाफिर "




बुधवार, मार्च 02, 2011


क्या है मेरे नसीब में सचमुच ख़बर नहीं 
जब है तेरा वजूद तो मुझको भी डर नहीं 

तूफां के डर से कांपता होगा ये समंदर 
दरिया पे ऐसे खौफ़ का कोई असर नहीं 

अपना बना के आपसे करता रहा फरेब 
क्यूँ कर हुज़ूर आपकी उस पर नज़र नहीं 

खाना-बदोश हूँ, मेरा अंदाज़ है अलग 
रहता हूँ जिस जगह वहां दीवारों-दर नहीं 

खाता है खौफ़ आस्मां जिसकी उड़ान से 
देखो वो इक परिंदा अब शाख पर नहीं 

बेवजह उसकी आप भी क्यूं जुस्तजू में हैं 
वो तो  है इक " मुसाफ़िर"वो हमसफ़र नहीं 

विलास पंडित  " मुसाफ़िर'

मंगलवार, फ़रवरी 15, 2011

ग़ज़ल

घर मेरे खुशियों को लाया कौन है
खुशबूएं  महकी हैं, आया कौन  है.

सादा पानी सारा अमरित हो गया 
आबशारों में नहाया  कौन  है.

सब्र लूटा, चैन छीना, नींद  भी
ये बता दे, ऐ खुदाया कौन है 

अपने ही मन की फ़क़त करता है वो 
जिस्म के भीतर समाया कौन है 

दिलके सब कमरे भी कम पड़ने लगे 
गठरियाँ ग़म की ये लाया कौन है

कितने दिल महफिल में बिखरे देखिये 
आज की महफ़िल में गाया कौन है 

हाथ में सूरज के है ये फैसला 
जिस्म है अब कौन, साया कौन है 

ना तो कोई ख्वाब है, ना है उमीद
रात भर जिसने जगाया कौन है 

तै नहीं कर पाया अब तक दोस्तों 
कौन है अपना, पराया कौन है 

आज के इस दौर का तो वो नहीं 
जिसने हर वादा निभाया कौन है

सोचता हूँ वो "मुसाफ़िर" तो नहीं 
हर कदम पर आज़माया, कौन है 

विलास पंडित "मुसाफ़िर"
[c] copyright by : Musafir 

सोमवार, फ़रवरी 07, 2011

प्यार...! ना...अब नहीं

इस ज़माने में.........यही रीत बना ली जाये 
दिल में अब इश्क़ की बुनियाद न डाली  जाये


शहर  में  रोज़ के हंगामे  हुआ करते हैं 
क्यूँ न बस्ती किसी  जंगल में बसाली  जाये 


कह रहे हैं यही तूफां  के बदलते तेवर 
अब कोई  नाव  समंदर में न डाली जाये 


कत्ल उसने ही किया है वोही कातिल है मगर 
क्यूँ ये बात ज़माने से छुपा ली  जाये 


मोहतरम  आप मुसाफ़िर हैं  "मुसाफ़िर" मैं  भी 
क्यूँ   न मिल- जुल  के कोई राह  निकली जाये 





विलास पंडित "मुसाफ़िर"  

मंगलवार, फ़रवरी 01, 2011

ग़ज़ल

जीवन है पल पल की उलझन, किस किस पल की बात करें 
इन लम्हों को भूल  के हम तुम गीत - ग़ज़ल की बात करें 

रोज़ ही पीना, रोज़ पिलाना . रोज़ ग़मों से टकराना 
इक दिन मय को भूल के आओ, गंगा जल की बात करें 

सौ बरसों के इस जीने से हासिल क्या हो पायेगा 
जिसने दिल को खुशियाँ दी हों, उस इक पल की बात करें 

क्या पाया है भीड़ में खोकर,  क्या पाया तन्हाई में 
आओ यारों इन रस्मों के फेर-बदल की बात करें 

आज वफ़ा की राह "मुसाफ़िर" धुंधली धुंधली लगती है 
कोहरा जिसने  बरसाया है, उस  बादल की बात करें 

विलास पंडित " मुसाफिर"
(C) Copyright By : Musafir