रविवार, अगस्त 22, 2010

Geetnuma Ghazal

बेपरवाह- नशीली जुल्फें

भीगा चेहरा,गीली जुल्फें



हाल बयां करती है दिल का

छूके जिस्म नुकीली जुल्फें



अक्स पे इक बादल का पेहरा

छोड़ी जब जब ढीली जुल्फें



सावन की बूंदों में भीगी

कितनी खूब रसीली जुल्फें


हुस्न छुपाना सीख गई हैं

धूप में ये चमकीली जुल्फें



साजन से तक़रार का आलम

हों जब जब पथरीली जुल्फें



यार मुसफ़िर शाइर क्या है

चेहरा जार, मटीली जुल्फें



विलास पंडित " मुसाफिर"

(c)Copyright By : Musafir

बेपरवाह- नशीली जुल्फें

भीगा चेहरा,गीली जुल्फें

हाल बयां करती है दिल का

छूके जिस्म नुकीली जुल्फें

अक्स पे इक बादल का पेहरा

छोड़ी जब जब ढीली जुल्फें

सावन की बूंदों में भीगी

कितनी खूब रसीली जुल्फें

हुस्न छुपाना सीख गई हैं

धूप में ये चमकीली जुल्फें

साजन से तक़रार का आलम

हों जब जब पथरीली जुल्फें

यार मुसफ़िर शाइर क्या है

चेहरा जार, मटीली जुल्फें

विलास पंडित " मुसाफिर"

(c)Copyright By : Musafir


गुरुवार, अगस्त 12, 2010

Ghazal


इस दौर के आख़िर क्या कहने, इस दौर में चाहत कुछ भी नहीं
दौलत की नुमाइश है हरसू, इंसान की कीमत कुछ भी नहीं

ये देख लिया, ये जान लिया, अब सच क्या है पहचान लिया
इस दौर में रिश्तो के मानी, एहसास-ओ- मुहब्बत कुछ भी नहीं

वो तुम ही थे, जो कहते थे, ये साथ कभी ना छूटेगा
तुम गैर की डोली में बैठे, ये तल्ख़ हकीकत कुछ भी नहीं

कुछ तेरे ख़त, कुछ तस्वीरें,कुछ ग़ज़लें और कुछ तेरा ग़म
यादें ही सम्हाले रक्खी हैं, और घर में सलामत कुछ भी नहीं

सिक्कों की खनक में जादू है, दौलत में अजब ही ख़ुश्बू है
इस प्यार की कीमत कुछ भी नहीं,जज़्बात की कीमत कुछ भी नहीं

विलास पंडित "मुसाफ़िर"
(c) copyright : Musafir

बुधवार, जुलाई 07, 2010

ghazal


ग़ज़ल
जिसका अपना कोई ज़मीर नहीं
मेरी नज़रों मे वो अमीर नहीं.

जिसकी जानिब हों ग़म ज़माने के
वो तो मुफलिस नहीं, फ़कीर नहीं

तल्ख़ बातें ज़ुबां से मत कीजे
बख्श दें रूह ये वो तीर नहीं

कोई खुशियों में, कोई है ग़म में
कौन ऐसा है जो असीर* नहीं

इक "मुसाफ़िर" हूँ अपनी मंज़िल का
मै तो ग़ालिब नहीं मैं मीर नहीं

विलास पंडित "मुसाफ़िर"
(c) copyright by :Musafir

शनिवार, जून 19, 2010

फूल से जब आप नश्तर हो गए
आदमी थे हम भी पत्थर हो गए

प्यार करके कुछ तो हासिल हो गया
आदमी थे हम भी शायर हो गए

हम मुक़म्मल क्या बताएं आपको
आपके सीने से लग कर हो गए

उनसे मिलने में हिचक होती है अब
वो हमारे कद से ऊपर हो गए

लोग इतने तेज़ जाते हैं कहाँ ?
हम तो आख़िर चूर थककर हो गए

मैं भला ग़ैरों को आख़िर क्या कहूँ
आजकल अपनों से बेहतर हो गए

नाम ही ने कर दिया रुसवा हमें
हम "मुसाफ़िर" थे सो बेघर हो गए

विलास पंडित "मुसाफ़िर"

(c) copyright by : Musafir

शनिवार, जून 12, 2010

ग़ज़ल

अपनी तो क़िस्मत रूठी है, झूटी है तकदीर मियां
वक़्त ने उस पर पैरों में भी बाँधी है ज़ंजीर मियां

तुम कहते हो जाकर देखो,शायद कुछ पा जाओगे
छोड़ो, रहने भी दो जाओ, बातों की तनवीर* मियां

उतने के उतने ही पाए ग़म के सागर में मोती
पैर फ़क़ीरों के भी चूमे,देख लिए सब पीर मियां

लोगों के घर की रौनक हैं दिलबर,दौलत,रंगों-फूल
अपने तो घर की रौनक है अपनी ही तस्वीर मियां

रोज़ ही ख्वाबों में आता था, उजड़ा सा वीरान शजर
इक दिन तन्हाई में समझे, ख्वाबों की ताबीर मियां

लाख "मुसाफ़िर"ग़ज़लें कहलो लेकिन इतना ध्यान रहे
एक ही थे "ग़ालिब' दुनिया में एक ही थे वो "मीर" मियां

शब्दार्थ = तनवीर =रौशनी

विलास पंडित "मुसाफ़िर"
(c) copyright by :Musafir

बुधवार, जून 02, 2010

ग़ज़ल
एक भी कतरा न छोड़ा कीजिये
दिल मेरा जब भी निचोड़ा कीजिये

आप ही के नाम से पहचान हो
नाम मेरा साथ जोड़ा कीजिये

सीधे सीधे चलके क्या हासिल हुआ
ज़िंदगी मुड़ती है, मोड़ा कीजिये

सिर्फ दुनिया पर ही सारी तोहमतें
खुद को भी आख़िर झंझोड़ा कीजिये

लेने वाले तो सभी कुछ ले गए
आप भी एहसान थोड़ा कीजिये

आपको ये हक़ मोहब्बत में दिया
दिल है मेरा खूब तोड़ा कीजिये

मैं "मसाफिर" हूँ मुझे चलना ही है
बा-अदब छाले न फोड़ा कीजिये

विलास पंडित "मुसाफिर"